Monday, 1 January 2018

शरीर की जैविक घड़ी

शरीर की जैविक घड़ी पर आधारित दिनचर्या
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अपनी दिनचर्या को कालचक्र के अनुरूप नियमित करें तो अधिकांश रोगों से रक्षा होती है और उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायुष्य की भी प्राप्ति होती है।

समय (उस समय विशेष सक्रिय अंगः सक्रिय अंग के अनुरूप कार्यों का विवरण

प्रातः 3 से 5 बजे (फेफड़े)- ब्राह्ममुहूर्त में उठने वाले व्यक्ति बुद्धिमान व उत्साही होते हैं। इस समय थोड़ा-सा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना चाहिए। दीर्घ-श्वसन भी करना चाहिए।

प्रातः 5 से 7 (बड़ी आँत)- जो इस समय सोये रहते हैं, मल त्याग नहीं करते, उन्हें कब्ज व कई अन्य रोग होते हैं। अतः प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल त्याग कर लें।

सुबह 7 से 9 (आमाशय या जठर)- इस समय (भोजन के 2 घंटे पूर्व) दूध अथवा फलों का रस या कोई पेट पदार्थ ले सकते हैं।

सुबह 9 से 11 (अग्नाशय व प्लीहा)- यह समय भोजन के लिए उपयुक्त है।

दोपहर 11 से 1 (हृदय)- करुणा, दया, प्रेम आदि हृदय की संवेदनाओं को विकसित एवं पोषित करने के लिए दोपहर 12 बजे के आसपास संध्या करें। भोजन वर्जित है।

दोपहर 1 से 3 (छोटी आँत)- भोजन के करीब 2 घंटे बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए। इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है।

दोपहर 3 से 5 (मूत्राशय)- 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृत्ति होगी।

शाम 5 से 7 (गुर्दे)- इस काल में हलका भोजन कर लेना चाहिए। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल में) भोजन न करें। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते हैं।

रात्रि 7 से 9 (मस्तिष्क)- प्रातः काल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है।

रात्रि 9 से 11 (रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरूरज्जु)- इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है और जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है।

11 से 1 (पित्ताशय)-  इस समय का जागरण पित्त को प्रकुपित कर अनिद्रा, सिरदर्द आदि पित्त विकार तथा नेत्र रोगों को उत्पन्न करता है। इस समय  जागते रहोगे तो बुढ़ापा जल्दी आयेगा।

1 से 3 (यकृत)- इस समय शरीर को गहरी नींद की जरूरत होती है। इसकी पूर्ति न होने पर पाचनतंत्र बिगड़ता है।

ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखें, जिससे ऊपर बताये समय में खुलकर भूख लगे।


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आजमाने योग्य उपयोगी ज्ञान वर्धक उपाय


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******** ज्ञान वर्धक उपाय ********
आजमाने योग्य उपयोगी
1. दांतों में कीडे लग जाने पर रात्रि को दांत में हींग दबाकर सोएँ। कीड़े खुद-ब-खुद निकल जाएंगे।
2. यदि शरीर के किसी हिस्से में कांटा चुभ गया हो तो उस स्थान पर हींग का घोल भर दें। कुछ समय में कांटा स्वतः निकल आएगा।
3. हींग में रोग-प्रतिरोधक क्षमता होती है। दाद, खाज, खुजली व अन्य चर्म रोगों में इसको पानी में घिसकर उन स्थानों पर लगाने से लाभ होता है।
4. हींग का लेप बवासीर, तिल्ली में लाभप्रद है।
5. कब्जियत की शिकायत होने पर हींग के चूर्ण में थोड़ा सा मीठा सोड़ा मिलाकर रात्रि को फांक लें, सबेरे शौच साफ होगा।
6. पेट के दर्द, अफारे, ऐंठन आदि में अजवाइन और नमक के साथ हींग का सेवन करें तो लाभ होगा।
7. पेट में कीड़े हो जाने पर हींग को पानी में घोलकर एनिमा लेने से पेट के कीड़े शीघ्र निकल आते हैं।
8. जख्म यदि कुछ समय तक खुला रहे तो उसमें छोटे-छोटे रोगाणु पनप जाते हैं। जख्म पर हींग का चूर्ण डालने से रोगाणु नष्ट हो जाते हैं।
9. प्रतिदिन के भोजन में दाल, कढ़ी व कुछ सब्जियों में हींग का उपयोग करने से भोजन को पचाने में सहायक होती है।
10. मासिक धर्म के दौरान होने वाली परेशानियां जैसे पेट में दर्द और मरोड़ या अनियमित मासिक धर्म में हींग का सेवन करने से फायदे होते हैं। यह औषधि कैंडिडा संक्रमण और ल्यूकोरहोइया से भी छुटकारा दिलाने में मददगार साबित होता है।
11. सूखी खांसी, अस्थमा, काली खांसी के लिए हींग और अदरक में शहद मिलाकर लेने से काफी आराम मिलता है।
12. हींग की मदद से शरीर में ज्यादा इन्सुलिन बनता है और ब्लड शुगर का स्तर नीचे गिरता है। ब्लड शुगर के स्तर को घटाने के लिए हींग में पका कड़वा कद्दू खाना चाहिए।
13. हींग में कोउमारिन होता है जो खून को पतला करने में मदद करता है और इसे जमने से रोकता है। हींग बढ़े हुए ट्राइग्लीसेराइड और कोलेस्ट्रोल को कम करता है और उच्च रक्तचाप को भी घटाता है।
14. यह औषधि विचार शक्ति को बढ़ाती है और इसलिए उन्माद, ऐंठन और दिमाग में खून की कमी से बेहोशी जैसे लक्षण से बचने के लिए भी हींग खाने की सलाह दी जाती है।
15. अफीम के असर को कम करने में हींग मदद करता है। इसलिए इसे विषहरण औषधि भी कहा जाता है।
16. शोध के अनुसार हींग में वह शक्ति होती है जो कर्क (कैंसर) रोग को बढ़ावा देने वाले सेल को पनपने से रोकता है।

🌼 *वात रोग क्या है*🌼

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          🙏🏻 *Jai Shree Balaji* 🙏🏻

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            🌼 *वात रोग क्या है*🌼
            🌼   *(vaat rog ?)* 🌼
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*आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथो के अनुसार किसी मनुष्य में होने वाले सभी रोगों का प्रमुख्य कारण वात, पित्त और कफ होता है जिसमे सबसे मुख्य और बड़ा कारण वात को माना गया है!*
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♻ *वात या वायु विकार को निम्न भागो ♻♻में बांटा गया है ->*                            ♻
♻ *1.उदान वायु-* उदान वायु कंठ में वास♻
♻ करती है,जैसे डकार आना !               ♻
♻ *2.अपान वायु -* बड़ी आंत से मलाशय♻♻                         तक!                      ♻
♻ *3.प्राण वायु-*प्राण ह्रदय के ऊपरी भाग♻            ♻                      में !                            ♻
♻ *4.व्यान वायु -* पूरे शरीर में फैली है !   ♻
♻ *5.समान वायु -* समान वायु का स्थान ♻♻ अमाशय और बड़ी आंत में होता है !     ♻
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*वात या वायु विकार किस प्रकार का है यह यदि योग्य चिकित्सक हो तो इसकी पहचान कर सही तरीके से इसका इलाज कर इस रोग से आपको मुक्ति दे सकता है एलोपैथी में इसकी पूर्ण चिकित्सा सम्भव नहीं है इसका पूर्ण इलाज केवल आयुर्वेद में ही सम्भव है!*
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       *वात रोग की पहचान और लक्षण*       
     *(identification and symptoms)*
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वात रोग या वायु विकार हो जाने पर मॉस पेशियों में खिचाव, दर्द, रीढ़ की हड्डी में दर्द होना सर में दर्द, मायग्रेन, गर्दन में दर्द, घुटनों में दर्द, हड्डियों में दर्द, जोड़ो में दर्द, छाती के बीच में दर्द, जोड़ो का फूलना, पेट का फूलना, मूत्र रोग जैसे पेशाब में जलन यूरिक एसिड का बढ़ जाना, डकारे ज्यादा आना, त्वचा का रूखा होना, वार वार मुंह का सूखना, प्यास अधिक लगना इत्यादि वात या वायु विकार के मुख्य लक्षण है|
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              *वात रोग होने के कारण*     
             *(reasons of Vat rog)*
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वात रोग होने का मुख्य कारण गरिठ भोजन (oily or junk food), दूषित भोजन जैसे रात का रखा हुआ, ठीक से न पका होना, सफाई से न पकाना इत्यादि ,खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना, ठंडा पानी पीना, दूषित पानी पीना, व्यायाम ना करना, देर तक सोना, मदिरा या शराब का सेवन करना, मांस खाना इत्यादि वायु विकार होने के मुख्य कारण है |
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          *कैसे पाये इस रोग से मुक्ति*
           *(how cure vaat rog)*
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* प्रतिदिन सुबह योग और व्यायाम की आदत डाले!
* रोज सुबह खाली पेट ग्वार का पाठा(alovera) का रस पीये!
* सुबह खाली पेट नीम गिलोय का रस पीये!
* आंवला चूर्ण नित्य सुबह उठ कर एक चम्मच खाली पेट ले!
* लहसुन को सूखा कर उसका चूर्ण बना ले हफ्ते में तीन दिन उसका सेवन करें!
* गुडहल के फूल का चूर्ण बना कर उसकी चाय बना कर पीने से वात, पित्त और कफ दोनों सामान्य हो जाते है!
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*वात से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार*



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*वात से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार* :-

✔आहार चिकित्सा :-

वात से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में रेशेदार भोजन (बिना पकाया हुआ भोजन) फल, सलाद तथा पत्तेदार सब्जियों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
मुनक्का, अंजीर, बेर, अदरक, तुलसी, गाजर, सोयाबीन, सौंफ तथा छोटी इलायची का भोजन में अधिक उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में लहसुन की 2-4 कलियां खानी चाहिए तथा अपने भोजन में मक्खन का उपयोग करना चाहिए इसके फलस्वरूप वात रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

✔उपवास :-

            वात रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले कुछ दिनों तक सब्जियों या फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके बाद अन्य चिकित्सा करनी चाहिए।

✔सूर्य चिकित्सा :-

वात के रोग से पीड़ित रोगी को अपने शरीर के रोगग्रस्त भाग पर प्रतिदिन सुबह के समय में एक हरे रंग का पारदर्शक शीशा लेकर, सूर्य के सामने इस प्रकार से खड़ा होना या बैठना चाहिए कि सूर्य की रोशनी इस पारदर्शक शीशे से होती हुई उसके रोगग्रस्त भाग पर पड़े। इस प्रकार से उपचार करने पर रोगी व्यक्ति को पता चलेगा कि एक हरे रंग का प्रकाश रोग ग्रस्त भाग पर पड़ रहा है। रोगी व्यक्ति को कम से कम प्रतिदिन इस क्रिया को 15 मिनट तक करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप उसका रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है, लेकिन इसके साथ-साथ रोगी व्यक्ति को खाने-पीने की चीजों का भी परहेज करना चाहिए।

वात के रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में प्रतिदिन नंगे बदन धूप में अपने शरीर की सिंकाई करनी चाहिए जिसके फलस्वरूप रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

✔जल चिकित्सा :-

वात रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करना चाहिए ताकि उसके पेट की गंदगी बाहर निकल सके।
वात रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कटिस्नान, मेहनस्नान, पादस्नान, उदरस्नान तथा सिर स्नान आदि करना चाहिए।

✔षटकर्म :-

           वात रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कुन्जल, वस्त्रधौती (दूध में कपड़े को भिगोंकर शरीर पर लपेटना), शंख-प्रक्षालन आदि करना चाहिए।

✔योगासन :-

           जिस व्यक्ति को वात रोग हो उसे प्रतिदिन इनमें से कोई भी एक या दो आसन करने से उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है जैसे- हलासन, भुजंगासन, पश्चिमोत्तासन, धनुरासन, वज्रासन, मयूरासन, मण्डुकासन, सुप्तपंवनमुक्तासन, कुर्मासन, सुप्तावज्रासन, उत्तानमण्डुकासन, अत्तानकूर्मासन, जानुशीर्षाशासन, पादहस्तासन तथा चक्रासन आदि।

✔प्राणायाम :-

           वात रोगी को प्रतिदिन भस्त्रिका प्राणायाम करना चाहिए। इसके फलस्वरूप उसका वात रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

✔मुद्रा :-

          वात से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन महामुद्रा, विपरीतकरणी, उडि्डयान बंध आदि करने से बहुत आराम मिलता है।

रोगों के कारण


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*आयुर्वेद में प्राकृतिक चिकित्सा का महत्व*

आयुर्वेद के अनुसार किसी भी तरह के रोग होने के 3 कारण होते हैं-

*वात:- शरीर में गैस बनना।*

*पित्त:- शरीर की गर्मी।*

*कफ:- शरीर में बलगम बनना।*

नोट:- किसी भी रोग के होने का कारण एक भी हो सकता है और दो भी हो सकते हैं या दोनों का मिश्रण भी हो सकता है या तीनों दोषों के कारण भी रोग हो सकता है।

1. *वात होने का कारण* :-

गलत भोजन, बेसन, मैदा, बारीक आटा तथा अधिक दालों का सेवन करने से शरीर में वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
दूषित भोजन, अधिक मांस का सेवन तथा बर्फ का सेवन करने के कारण वात दोष उत्पन्न जाता है।
आलसी जीवन, सूर्यस्नान, तथा व्यायाम की कमी के कारण पाचन क्रिया कमजोर हो जाती है जिसके कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
इन सभी कारणों से पेट में कब्ज (गंदी वायु) बनने लगती है और यही वायु शरीर में जहां भी रुकती है, फंसती है या टकराती है, वहां दर्द होता है। यही दर्द वात दोष कहलाता है।

2. *पित्त होने का कारण* :-

पित्त दोष होने का कारण मूल रुप से गलत आहार है जैसे- चीनी, नमक तथा मिर्चमसाले का अधिक सेवन करना।
नशीली चीजों तथा दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण पित्त दोष उत्पन्न होता है।
दूषित भोजन तथा केवल पके हुए भोजन का सेवन करने से पित्त दोष उत्पन्न होता है।
भोजन में कम से कम 75 से 80 प्रतिशत क्षारीय पदार्थ (फल, सब्जियां इत्यादि अपक्वाहार) तथा 20 से 25 प्रतिशत अम्लीय पक्वाहार पदार्थ होने चाहिए। जब इसके विपरीत स्थिति होती है तो शरीर में अम्लता बढ़ जाती हैं और पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है।


3. *कफ होने का कारण:-*

तेल, मक्खन तथा घी आदि चिकनाई वाली चीजों को हजम करने के लिए बहुत अधिक कार्य करने तथा व्यायाम की आवश्यकता होती है और जब इसका अभाव होता है तो पाचनक्रिया कम हो जाती है और पाचनक्रिया की क्षमता से अधिक मात्रा में चिकनाई वाली वस्तुएं सेवन करते हैं तो कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
रात के समय में दूध या दही का सेवन करने से कफ दोष उत्पन्न हो जाता है

✔ _वात, पित्त और कफ के कारण होने वाले रोग निम्नलिखित हैं_ -

 *वात के कारण होने वाले रोग* :-

          अफारा, टांगों में दर्द, पेट में वायु बनना, जोड़ों में दर्द, लकवा, साइटिका, शरीर के अंगों का सुन्न हो जाना, शिथिल होना, कांपना, फड़कना, टेढ़ा हो जाना, दर्द, नाड़ियों में खिंचाव, कम सुनना, वात ज्वर तथा शरीर के किसी भी भाग में अचानक दर्द हो जाना आदि।

 *पित्त के कारण होने वाले रोग* :-

          पेट, छाती, शरीर आदि में जलन होना, खट्टी डकारें आना, पित्ती उछलना (एलर्जी), रक्ताल्पता (खून की कमी), चर्म रोग (खुजली, फोड़े तथा फुन्सियां आदि), कुष्ठरोग, जिगर के रोग, तिल्ली की वृद्धि हो जाना, शरीर में कमजोरी आना, गुर्दे तथा हृदय के रोग आदि।

 *कफ के कारण होने वाले रोग* :-

         बार-बार बलगम निकलना, सर्दी लगना, श्वसन संस्थान सम्बंधी रोग (खांसी, दमा आदि), शरीर का फूलना, मोटापा बढ़ना, जुकाम होना तथा फेफड़ों की टी.बी. आदि।

Sunday, 31 December 2017

घी के लाभ।। घी से उपचार



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घी खाइए, सेहत का खजाना पाइए :

(1) तेल बार-बार गर्म करने से खराब होते है और ट्रांस फैट में बदलते है यही ट्रांस फैट शरीर में जमता है और बीमारियों का कारण बनता है। परंतु इसके विपरीत घी को उबाल कर ही शुद्ध किया जाता है। सबसे ज्यादा स्मोक पॉइंट होने के कारण घी अधिक तापमान को भी सहन करने की क्षमता रखता है।

(2) घी न केवल हमारे भोजन के स्वाद को बढ़ाता है बल्कि भोजन में घी होने से, कम मात्रा में भोजन करने पर ही भूख शांत होने लगती है। इस प्रकार हम अधिक मात्रा में खाने से बचते हैं।

(3) घी हमारे आमाशय की जठराग्नि को उसी प्रकार प्रचंड करता है जिस प्रकार यज्ञ की अग्नि को। अतः घी न केवल स्वयं शीघ्रता से पचता है बल्कि भोजन के अन्य अवयवों को भी पचाता है।

(4) घी में विटामिन ए, डी, इ, के एवं बी12 प्रचुर मात्रा में होते हैं। इनमें से विटामिन A व D एंटीआक्सीडेंट होते हैं । अतः घी स्वयं एक एंटीआक्सीडेंट की तरह काम करता है और हमारे शरीर की कोशिकाओं को क्षति से बचाता है। घी हमारे जोड़ों को मजबूती देता है।

(5) घी हमारे शरीर में 'गुड गट बैक्टीरिया' को बढ़ाता है जो कि भोजन के पाचन एवं अवशोषण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। घी में मौजूद फैट को प्रीबायोटिक का दर्जा दिया गया है I इस प्रकार भोजन में घी का होना अपच, कब्जी, पेट के फुलाव आदि का स्वाभाविक इलाज है ।

(6) इसी प्रीबायोटिक गुण के कारण घी सबसे अच्छा anti allergen भी है क्योंकि तरह-तरह की फूड एलर्जी का कारण आंतों के बैक्टीरिया का कम होना है ।

(7) कच्चे दूध से निकाले गए सफेद मक्खन में wulzen factor मौजूद होता है जो जोड़ों की सामान्य बीमारियों में एवं गठिया में लाभकारी होता है। wulzen factor को anti stiffness factor एवं anti arthritic nutrient भी कहते है।

(8) घी में मौजूद तत्व कंजुगेटेड लिनोलिक एसिड (CLA) शरीर की चर्बी को गलाने में सहायक होता है। अतः जिस प्रकार लोहा लोहे को पिघला देता है उसी प्रकार शरीर की चर्बी को गलाने के लिए हमें गुड फैट की आवश्यकता होती है l

(9) घी में मौजूद फैटी एसिडस् झुर्रियों रहित, दमकती त्वचा प्रदान करते है। बालों में मजबूती एवं चमक देते हैं।

(10) भोजन में घी की कमी होने से ही भोजन के उपरांत मीठा खाने की इच्छा बनी रहती है।

(11) घी भोजन की ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) को कम करता है अर्थात घी के प्रयोग से, लिए गए भोजन की ग्लूकोस, खून में धीरे धीरे पहुंचती है। ऐसा डायबिटीज एवं दिल की बीमारियों के मरीजों के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। यही कारण है कि पुराने जमाने से ही खिचड़ी, दाल चावल एवं अन्य कई व्यंजनों में ऊपर से घी डालकर खाया जाता है। खून में ग्लूकोज धीरे-धीरे रिलीज होने से शरीर एवं दिमाग में ग्लूकोस का सतत् लेवल बना रहता है।

(12) घी में मौजूद फैट आसानी से दिमाग में पहुंचते हैं और सोचने समझने की शक्ति को विकसित करने में लाभदायक होते हैं।

(13) 2015 में  US FDA ने स्वीकार किया कि भोजन में कोलेस्ट्रॉल लेने और दिल की बीमारियों में कोई संबंध नहीं है एवं कोलेस्ट्रॉल युक्त भोजन को ना लेने का कोई कारण नहीं है। परंतु 30- 40 साल तक जो गलत धारणा बनी हुई थी उसके चलते हमने ना केवल घी बल्कि मूंगफली, काजू, नारियल जैसी बेहद लाभदायक चीजों को भी खाना छोड़ दिया था। और तो और दूध भी लो फैट ही लाने लगे।

(14) जून 2014 में UK FOOD GUIDELINES (NICE) ने माना कि भोजन में ओमेगा 3 फैटी एसिड्स लेने की आवश्यकता कतई नहीं है। क्योंकि यदि ओमेगा 3 एवं ओमेगा 6 फैटी एसिड्स को भोजन में ज्यादा लिया जाता है तो यह शरीर में ट्रांस फैट में बदल जाते हैं और अंगों को क्षति पहुंचाते हैं।

(15) चाहे हम घी खाएं या तेल सभी में समान कैलोरी होती है । सभी फैट के 1 ग्राम से 9 किलो कैलोरी मिलती है।

(16) घी के प्रति हमारे मन में यह डर फ़ूड इंडस्ट्री की काली करतूतों की वजह से ही पनपा है क्योंकि यदि घी एवं अन्य पारंपरिक कच्ची घानी के तेलों को को बदनाम न किया जाता तो फ़ूड इंडस्ट्री सफोला, फार्च्यून रिफाइंड, एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल जैसे तेलों को, दिल के लिए लाभकारी बताकर घर-घर ना पहुंचा पाती।

(17) इसलिए सभी व्यक्तियो को चाहे वे अपच, मोटापा, शुगर, BP या दिल की बीमारी से ही ग्रसित क्यों ना हो, भोजन में शुद्ध घी का प्रयोग भरपूर मात्रा में करना चाहिए।

यदि अभी भी आप घी के प्रति असमंजस में हैं तो दिमाग की सोचने समझने की शक्ति को विकसित करने के लिए घी खाइए ।

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मधुमेह(sugar)* के *रोगी ध्यान*दे*


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       *मधुमेह(sugar)*
              के
        *रोगी ध्यान*दे*
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🌺शुगर जेसे हठीले रोग को लाइलाज माना जाता है,डायबिटीज अब उम्र देश व् परिस्थिति की सीमाओं को लाँघ चूका है। इसके मरीजों का तेजी से बढ़ता ग्राफ चिंता का विषय है। हमने अथक मेहनत से इसको मेंटेन करने के लिए परम्परागत आयुर्वेद के साथ आधुनिक रीसर्च के सहारे घंसत्व का उपयोग करके इस दवा को बेहद ही लाभकारी बनाया है।  आम लोगों की सेवार्थ यह नुस्खा यहाँ बता रहा हूँ, आजमाकर देखे।
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इसमे कुटकी,चिरायता,आम की गुठली,जामुन,अलोयविरा,सदाबहार,नीम, करेला,मेथी,अश्वगंधा,शुद्ध कुचला,इत्यादि कीमती जड़ीबूटियों के साथ बसन्त कुसुमाकर रस (स्वर्णयुक्त)का मिश्रण किया गया हैं। जो शारीरिक और मानसिक कमजोरी को दूर कर शरीर को नई ताकत देता है।
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✅इस दवा के नियमित सेवन से इन्सुलिन के इंजेक्सन छूट जाते हैं, और रोगी अपनी सामान्य जिंदगी आराम से जी सकता है।
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 *कृप्या ध्यान दे :----*

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➡य दवा शुगर को प्राकृतिक रूप से मेंटेन करती हैं, हम पैंक्रिओस को ठीक करने का दावा नही करते है, क्योंकि जो शारीरिक अंग ख़राब हो गया उसे ये दवा ठीक नही करती है।
ये पूर्णरूपेण शुगर को मेंटेन रखती है तथा शुगर से आई कमजोरी को मिटाती है
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मधुमेह के रोगी मीठे का परहेज करे और आवश्यकतानुसार निम्न का प्रयोग करें---------

1--नीबू: मधुमेह के मरीज को प्यास अधिक लगती है। अतः बार-बार प्यास लगने की अवस्था में नीबू निचोड़कर पीने से प्यास की अधिकता शांत होती है❗

2--खीरा: मधुमेह के मरीजों को भूख से थोड़ा कम तथा हल्का भोजन लेने की सलाह दी जाती है। ऐसे में बार-बार भूख महसूस होती है। इस स्थिति में खीरा खाकर भूख मिटाना चाहिए❗

3--गाजर-पालक : इन रोगियों को गाजर-पालक का रस मिलाकर पीना चाहिए। इससे आंखों की कमजोरी दूर होती है❗

3--शलजम : मधुमेह के रोगी को तरोई, लौकी, परवल, पालक, पपीता आदि का प्रयोग ज्यादा करना चाहिए। शलजम के प्रयोग से भी रक्त में स्थित शर्करा की मात्रा कम होने लगती है। अतः शलजम की सब्जी, पराठे, सलाद आदि चीजें स्वाद बदल-बदलकर ले सकते हैं❗

4--जामुन : मधुमेह के उपचार में जामुन एक पारंपरिक औषधि है। जामुन को मधुमेह के रोगी का ही फल कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि इसकी गुठली, छाल, रस और गूदा सभी मधुमेह में बेहद फायदेमंद हैं। मौसम के अनुरूप जामुन का सेवन औषधि के रूप में खूब करना चाहिए❗

5--महीने में 5--6 बार करेले की सब्जी बनाकर खानी चाहिए❗
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